Thursday, 25 January 2018

कभी यूँ आओ कि रूह छू लो मैं हूँ आवारा बंजारा भटकता फिर रहा हूँ कबसे ...

कभी यूँ आओ
कि रूह छू लो
मैं हूँ आवारा बंजारा 
भटकता फिर रहा हूँ कबसे
मेरी आवारगी को सुकूँ बख़्शो।
छू लो यूँ कि पिघल जाऊँ
फिर मुझे घूँट-घूँट पी लो
बनके ख़ुशबू उतर जाओ नफ़स में
मैं तो ख़ुद में रहा हूँ देर तक
अब तुम रह लो।
एक बोसा लो माथे का
और मुझे जीतकर रख लो
कभी जब गूँजती हों ख़ामोशियाँ
बैठ जाओ मेरे संग
तुम भी ये बरकत-ओ-रहमत पी लो।

Source : https://www.facebook.com/kalyuginarad/posts/1680241038681706


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